कांग्रेस के किसी भी सांचे मे फिट नहीं हो रहे थे राजबब्बर?

नई दिल्ली 21 मार्चः अभिनेता से राजनेता की पारी खेलने वाले राजबब्बर कांग्रेस के किसी भी फारमेट मे फिट नहीं बैठ रहे थे। चुनाव खांचे मे उप चुनाव, नगर निगम, लोकसभा से लेकर विधानसभा स्तर तक मे पार्टी की स्थिति दिन पर दिन गिरती ही जा रही थी। जानकार मान रहे है कि मौका देख पार्टी ने ब्राहमण को मनाने की दिशा मे तेजी से कदम बढ़ाया है और राज बब्बर को भी दूसरे काम मे लगाने की योजना बना ली।
आइये समझते है कि राज बब्बर कांग्रेस के लिये किस प्रकार से नाकाम साबित हो रहे थे। पहले तो वो सपा और बसपा के बीच कांग्रेस की गठबंधन की संभावनाओ मे खरे उतरते नजर नहीं आ रहे।
सपा से कांग्रेस मे आये राज बब्बर के चलते पार्टी को लगता है कि दोनो दल से दूरियां शायद ही कम हो पाएं। जबकि पार्टी लोकसभा चुनाव मे गठबंधन की संभावनाओ को पूरी तरह से खत्म नहीं करना चाहती।




राज बब्बर उत्तर प्रदेश के बदलते सियासी समीकरण में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं. सूबे में बीजेपी राजपूत नेतृत्व के साथ सत्ता में है और ओबीसी को साधने की कवायद में है. वहीं बसपा-सपा की दोस्ती परवान चढ़ रही है. इन दोनों दलों के साथ आने से नया जातीय गणित बना है. ऐसे में कांग्रेस भी जातीय समीकरण साधने में जुट गई है. पार्टी सूबे में अपने परंपरागत ब्राह्मण वोट की ओेर लौटना चाहती है, इसी के मद्देनजर राज बब्बर की प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी हुई है.



उत्तर प्रदेश में राज बब्बर के नेतृत्व में पार्टी ने 2017 विधानसभा चुनाव, नगर निकाय चुनाव और उपचुनाव लड़ा लेकिन उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा. विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस मिलकर लड़ी थीं. इसके बावजूद पार्टी के विधायकों की संख्या 29 से घटकर 7 पर आ गई. नगर निकाय चुनाव में भी पार्टी को करारी हार मिली. उपचुनाव में तो पार्टी अपनी जमानत भी नहीं बचा सकी. उसे 2014 लोकसभा चुनाव से भी कम वोट मिले.
यूपी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर के इस्तीफ के बाद माना जा रहा है कि पार्टी किसी ब्राहमण चेहरे को इस पद का काबिज कर सकती है। पार्टी की मंशा प्रदेश के उन 12 फीसद ब्राहमण को पाले मे करने की है, जो लंबे समय से नाराज चल रहे हैं। पार्टी को उपचुनाव मे ब्राहमण की नाराजगी भी झेलना पड़ी है।
राज बब्बर का अभी इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। वैसे उनके स्थान पर जिन नाम की चर्चा है, ब्राहमण हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अधिवेशन मे संकेत भी दिये थे कि बदलाव को तैयार रहे। यानि इसकी शुरूआत यूपी से होने जा रही है।

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