युवा दूसरो की पीड़ा को अपना समझे-प्रतिपाल

आज की तारीख़ 23 मार्च ये ज्यादा महत्वपूर्ण तारीख़ समाजवादी भारत के लिए शायद ही हो। आज का दिन याद किया जाता है दो कारणों से, पहला भारतीय समाजवाद के शिखरपुरुष डॉ राम मनोहर लोहिया की जंयती और दूसरा महान क्रांतिकारी, दूरदृष्टि के स्वामी और अद्वितीय विचारक शहीद ए आज़म भगत सिंह, उनके क्रांतिकारी साथी सुखदेव और राजगुरु के बलिदान दिवस के रूप में।
आज़ादी के पहले भगत सिंह ने अपने क्रन्तिकारी साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिष्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के माध्यम से बहरी अंग्रेजी हुकूमत को क्रांति के धमके से झकझोर के रख दिया। वही लोहिया जी ने आज़ादी के पहले अगस्त क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वंही आज़ादी के बाद देश के अंतिम व्यक्ति के लिए खड़े होने का सन्देश दिया।
भगत सिंह कहते थे कि अंग्रेजो से आज़ादी हमारी लड़ाई का एक पड़ाव भर है हमारी असली लड़ाई शोषण से है, भेदभाव से है, असमानता से। गोरे तो चले जायेंगे लेकिन भूरे हमारा शोषण बन्द नही करेंगे जब हमारे अंदर रूढ़िवादिता व्यापत है। रूढ़िवादिता हमेशा शोषण के नए रास्ते तलाश करती है। जो भी व्यक्ति विकास के लिए और आज़ादी के लिए खड़ा है उसको तमाम रूढ़िवादी परंपराओं को नकारना होगा। तभी एक समाजवादी वतन बन पाएगा जंहा अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का झगड़ा नही होगा।
भगत सिंह कहते थे क्रांति बंदूक की नली से नही विचारों की शान पर तेज़ होती है। बन्दुक उठाना क्रांति का हिस्सा है संपूर्ण क्रांति नही। शायद यही वजह थी की उन्होंने खुद का आत्मसमर्पण कर दिया था। और सज़ा माफ़ी की आवाजें जब तेज़ हुई तो उन्होंने पत्र लिखा अंग्रेजी सरकार को कि उनको अपने किये का कोई पछतावा नही है और न उन्हें माफ़ी की भीख चाहिये हो। आज़ादी हमारा अधिकार है हम इसको छीन के लेंगे। भगत सिंह के विचार आज भी प्रासंगिक है बस जरूरत है कैंडी क्रश से बाहर निकल कर अपने अपने गुरुर को कम करे दूसरे की पीड़ा को समझने की।
आज़ादी के बाद जब देश में तानाशाही और साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता सत्ता के गुणा गणित की वजह से बढ़ने लगा तब समाजवादी चिंतक *डॉ लोहिया* गैर कांग्रेसवाद के शिल्पकार बन के उभरे और विशाल कांग्रेस पार्ट के सर्वशक्तिमान पंडित नेहरू से अकेले मोर्चा लिया। डॉ लोहिया *जाति तोड़ो देश जोड़ो* के नारे को लेकर दबे,कुचले,पिछड़े(आर्थिक व सामाजिक) लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संघर्ष रत रहे। उनका कहना था कि जब भेदभाव खत्म होगा तब समानता आएगी और जब समानता आयेगी संपन्नता तभी संभव है। समाजवाद का अर्थ है : समानता+संपन्नता। डॉ लोहिया कथनी और करनी का एक होने की वकालत करते थे और खुद उसके सबसे बड़े उदाहरण बने। 1967 से जब वो बीमार हुए तो लोगों ने उनसे विदेश जाकर इलाज करवाने की सलाह दी। तब उन्होंने कहा कि वो अपना इलाज उसी अस्पताल में करवाएंगे जंहा उनके देश के आम लोग करवाते हैं, और कई दिन अस्पताल में रहने के बाद वो दिल्ली एक अस्पताल में दिवंगत हो गए जो आजकल डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल के नाम से जाना जाता है।
वर्तमान में चाहिए कि हम लोग खासकर युवा लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझते हुए लोहिया और भगत सिंह के विचारों को आत्मसात करते हुए हर उस विचारधारा और व्यक्ति का विरोध करे जो भेदभाब, ऊंच-नीच, छोटा बड़ा, की खाई को बड़ा कर रहा है चाहे वो किसी भी पद पर हो या कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो।
यही इन महान विभूतियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।इस मौके पर सपा के युवा नेता राहुल सक्सेना, सैयद अली, आशीष पटेल सहित कई युवा मौजूद रहे।
जय हिंद
जय समाजवाद
इंक़लाब ज़िंदाबाद
🏻प्रतिपाल सिंह
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड

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