झांसी-कत्लखाना का दाग, चेहरो से कैसे हटेगा नकाब!

झांसी-बुन्देलखण्ड की पावन धरती पर खुला कत्लखाना बुन्देलियो  की छाती को कसोट रहा है। कमाल इस बात का है कि जिन्होने गंगा की तरह पवित्र राजनीति करने की कसमे खायी, वो भी इस कत्लखाने से बहने वाले खून की दुर्गन्ध से बेहाल नहीं हैं! ऐसे दोहरे चेहरे वालो  से पहल की उम्मीद नहीं होने से परेशान झासीवासी इस कत्लखाने को हटाने के लिये कमर कस रहे हैं। एक बड़ा जन आंदोलन की रूप रेखा तैयार हो रही है।

आपको बता दे कि आज से कुछ साल पहले जब झासी मे पशुबधशाला को लेकर नगर निगम की ओर से पहल की गयी, तो बीजेपी, कांग्रेस, बसपा सहित सभी दलो  के नेताओ  और संगठनो  ने विरोध के स्वर दागे थे।

विरोध की आवाज इतनी बुलंद थी कि कत्लखाने की नींव डालने वालो  के हाथपांव कांप उठे और उन्होने अपने इरादे  का प्रस्ताव ठंडे बस्ते मे डाल दिया। इसके बाद किसी ने पशुबधशाला का जिक्र तक नहीं किया।

हैरानी की बात यह है कि सरकार बदलने के बाद पावन धरती पर सबसे पहले कत्लखाना खुलने की शुरूआत हुयी। बाहरी व्यक्ति ने कत्लखाना खोला भी, तो उस धरती पर जहां राम का राज है।

इस कत्लखाने का भारतीय प्रजाशक्ति पार्टी लगातार विरोध कर रही है। अध्यक्ष पंकज रावत का कहना है कि बुन्देलखण्ड की धरती पर कत्लखाना मंजूर नहीं है। उन्होने राजनैतिक दलो  के इस मुददे पर चुप रहने को लेकर सवाल भी उठाये।

यही कारण है कि अब आम आदमी कत्लखाना को जड़ से उखाड़ने के लिये मंदिर से सड़क पर संघर्ष की रूपरेखा तैयार कर रहा है। समर्थन की मुहिम मे सभासद, वकील, धर्मगुरू, मंदिर के पुजारी की सहमति ने जोश और उत्साह को आंदोलन के लिये लबरेज कर दिया है।

यकीन मानिये जिस दिन यह जोश सड़क पर अपने पूरी उत्साह और लबरेज से आएगा, उस दिन कत्लखाना खोलने वाले वो चेहरे बेनकाब होगे, जिन्हे देखने के बाद बुन्देलियो  के पैरो  तले जमीन खिसक जाएगी। अभी तो यह दाग ही दिखता है, चेहरे नहीं।

 

 

 

 

 

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