लखनउ 8 मईः कलम, कला और कृपाण की बुन्देली धरती इन दिनो किसी काम की नहीं रह गयी। अपनी प्यास बुझाने की आस मे सांसे टूटती नजर आ रही है। रहनुमा पत्थर दिल हो गये हैं। पता नहीं, किसी माननीय का दिल कब पसीजेगा? कब प्यास बुझेगी? अभी तो पथ पर चलते पैर पानी की तलाश मे भटक रहे हैं।
यह कैसा दुर्भाग्य है कि जिस माटी से सत्ता के केन्द्र मे विराजमान होने वाली सरकारे वादे का पिटारा माटी के आंगन मे खोलने का वादा करती हैं, लेकिन पीछे मुड़कर नहीं देखती।
सन 2014 का आम चुनाव हो या फिर 2017 का विधानसभा चुनाव। दोनो चुनाव मे बुन्देली माटी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की झोली भरी। पूरी सीटे लुटा दी। इस आस मे कि प्यास का पुख्ता इंतजाम होगा। किसान माटी को हरा भरा करने मे आसमान की ओर नहीं ताकेगा।
पर, हाय री किस्मत। सत्ता मे आयी सरकारे बेदर्द हो गयी। बुन्देलखण्ड की ओर देखा भी नहीं। बात आयी, तो कभी कारीडोर, तो कभी बुन्देलखण्ड निधि का झुनझुना हिला कर राहत देने राग अलाप दिया।
जिन्दगी की डोर पानी पर निर्भर होती है। किसान माटी को सींचेगा, तभी धरती अन्न उगलेगी। पानी माटी की प्यास नहीं बुझा पा रहा। जनता के घर मे मटके सूखे हैं। हां, दौलतमंद आरओ का पानी पी रहे।
जिनके घर नल का कनेक्शन नहीं, वो हैंडपंप के सहारे हैं। हैंडपंप मे पानी नहीं। टैकर जैस भीख की तरह दिये जाते। एक मुहल्ले मे एक टैंकर पहुंचा, तो जंग होने लगती।
गांव मे हालात बेहद खराब हैं। आज मउ-गुरसरायं मार्ग पर लोग प्रदर्शन करने पहुंच गये। सांसद दिल्ली मे, तो विधायक लखनउ मे डेरा जमाये हैं। बाकी विधायक सत्ता के आसरे स्थानीय राजनीति की जोड़तोड़ मे उलझे हैं।
किसानो का मसीहा होने का दम भरने वाले जवाहर राजपूत अपनी बेबसी से आगे कुछ नहीं कर पा रहे। जिनके हाथ मे कुछ करने की ताकत हैं। वो खामोश है। विपक्ष मे सपा, बसपा और कांग्रेस को भाजपा का खौफ है। जैसे जनता के मुददे उठायेगे, तो गुनाह कर देगे।
थोड़ी हिम्मत कांग्रेस के नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने दिखायी। कम से कम जलसंस्थान मे जाकर मटके तो फोड़ आये। राज्यसभा मे बुन्देलखण्ड की आवाज उठाने का दम भरने वाले चन्द्रपाल सिंह यादव भी गर्मी की मार से बेहाल हैं। गरौठा के पूर्व विधायक मप्र के चुनाव मे व्यस्त हैं। बसपा कैडर मे दमदार नेता नहीं।
ऐसे मे पानी के लिये राह तलाश रहे कदम आज भी कदम-कदम चलकर पानी की तलाश कर रहे हैं। इस भरोसे मे कि किसी दिन माटी और कंठ की प्यास बुझाने कोई तो मसीहा आएगा?
