1925 से 2025 तक भारतीय हॉकी की 100 वर्षों की ये यात्रा भारतीयों को गर्वित करने वाली रही है।जिसके महानायक हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद रहे।
ऐतिहासिक हीरोज मैदान की बहुत ही मनमोहक तस्वीर जहां अपने पिता हॉकी के महानायक ओलंपिक में लगातार तीन स्वर्ण पदक जीतने वाले मेजर ध्यानचंद समाधि स्थल पर विश्वकप गोल्ड मेडलिस्ट उनके पुत्र अशोक कुमार की ये तस्वीर हॉकी के शताब्दी वर्ष पर स्वर्णिम युग को ताजा कर हर भारतीय को प्रेरित भी कर रही है।
झांसी हीरोज क्लब के मैदान पर (नीले रंग की प्रतिमा) हिल के ऊपर भी एक और मेजर ध्यानचंद की प्रतिमा अपने आप हॉकी की स्वर्ण गाथा बयान करती है। हीरोज़ क्लब पर खेलकर ही मेजर ध्यानचंद और उनके छोटे भाई कैप्टन रूप सिंह ने आज़ादी से पहले भारत को दुनिया में सम्मान दिलाया और एक पहचान दिलाई। झाँसी हीरोज़ क्लब के “चाँद” ध्यान सिंह ने 1936 के बर्लिन ओलंपिक में जर्मन तानाशाह हिटलर के ये कहने पर कि ध्यानचंद तुम मेरे देश के लिए खेलो, मैं तुम्हें बड़ा ओहदा दूंगा पर लेंस नायक ध्यानचंद ने कहा कि नहीं, मैं सिर्फ अपने देश भारत के लिए ही खेलूंगा.ये जवाब देकर भारतीयों का माथा गर्व से ऊंचा कर दिया था।
झाँसी हीरोज क्लब के इसी मैदान पर खेल कर ध्यानचंद परिवार की 3 पीढ़ी ने देश के लिए 14 पदक जीते। 6 ओलंपिक पदक, 3 विश्व कप पदक, 4 एशियाई खेल पदक और 1 रेने फ्रैंक अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक देश को समर्पित किये हैं।
बृजेंद्र यादव
खेल विश्लेषक
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भारतीय हॉकी की 100 वर्षों की यात्रा, जिसके महानायक हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद रहे
