गर्व करो कि हम संकटग्रस्त झांसी मे रहते हैं! रिपोर्ट-देवेन्द्र कुमार व रोहित

झांसीः आजाद भारत की तस्वीर बनाने मे जिस वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने जीवन का बलिदान कर दिया, आज भी उस वीरांगना की नगरी संकटग्रस्त है। पानी, बिजली, सड़क, अतिक्रमण, अवैध निर्माण, सिंचाई, बेरोजगारी जैसे मुददे सदियां बीतने के बाद भी हल नहीं हो सके। सवाल है कि क्या जनप्रतिनिधियो  के पास इन मुददो  को हल करने की सोच नहीं है या फिर वोट की खातिर वोट बैंक बनाये रखने के लिये इन मुददो  को आज तक लटकाये रखा गया है?

कलम, कला और कृपाण की धरती मे सड़के आजादी के बाद खुली होने की जगह और सकरी होती जा रही हैं। हर चीज मे बढ़ोत्तरी हो रही है। सुविधाओ  को लेकर लोग डिमांड मोड पर हैं, लेकिन विकास का पथ किसी भी रास्ते पर नजर नही आ रहा।

सदियां बीत रही है। पानी के लिये झांसी आज भी प्यासी है। कितना दुर्भाग्य है कि झांसी के अनेक इलाके मे टैकर से पानी की सप्लाई हो रही है। हर गर्मी मे पानी की समस्या होती है, यह जानते हुये भी किसी भी दल के नेता ने इस दिशा मंे ठोस प्रयास नहीं किया।

विधायक रवि शर्मा पिछले दस साल से पानी के लिये बराठा योजना का राग गा रहे हैं। हां, समस्याग्रस्त इलाके मे टैंकर भेजने की अपनी डयूटी निभाने मे वो पीछे नहीं रहते। यहां सवाल उठता है कि क्या टैंकर भेजकर झांसी की प्यास बुझाने का काम यूं ही चलता रहेगा?

इसके अलावा सड़क पर जैम के हालात जस के तस बने हुये हैं। पीढ़ियां बदल रही है, लेकिन सड़क पर खुलापन किसी को नसीब नहीं हो रहा। नगर के मुख्य बाजार अतिक्रमण ग्रस्त है। प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधि अच्छी तरह जानते हैं। सब खामोश है। दो दिन दहाड़ते हैं। हल्ला करते। व्यापारी से लेकर समाजसेवी जुटते हैं। फिर वही स्थिति बन जाती।

मानिक चैक हो या फिर सीपरी बाजार। अतिक्रमण से लेकर सड़क की खराबी को लेकर मेयर, विधायक, विपक्ष और समाजसेवी संगठनो  मे अच्छा होने पर श्रेय लेने की होड़ मच जाती है। चंद दिनो  की चांदनी के बाद अंधेरे के हालात झांसी का भाग्य बन गये हैं।

यह बात सभी को अच्छी तरह पता है कि शादी विवाह आदि मौसम मे बाजार तंग हो जाते हैं। इसके बाद भी स्थायी व्यवस्था का कोई इंतजाम नहीं किया गया। बाजार मे हाथ ठेला फ्री होल्ड हैं। वाहन मन चाहे स्थान पर खड़ा करने की छूट है। आखिर कोई ठोस नीति क्यो नहीं बनती। किसान सिंचाई को लेकर परेशान है। बेतवा भवन घेरने के लिये किसान नेता चले आते हैं, फिर वापस नहीं आते। बेरोजगार को नौकरी का इंतजाम प्राइवेट स्तर पर भी ठोस नही है। क्या मीडिया मे खबर आने के बाद ही हालात से निपटने की नीति अपनाकर प्रशासन और जनप्रतिनिधि अपने कर्तत्व निभाने की आदत को जारी रखेगे? यहां सवाल यह है कि क्या जनता सिर्फ नेताओ  के आश्वासन और वोट के लिये मुददो  को सदियो  तक लटकते देखती रहेगी?

 

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