देहरादून।
उत्तराँचल यूनिवर्सिटी के विधि प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित नें आज शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निचली न्यायिक सेवा (सिविल जज जूनियर डिवीजन) में नियुक्ति के लिए अनिवार्य 3 वर्ष के प्रैक्टिस नियम की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई पर सभी हाईकोर्टों को दिये निर्देश की समीक्षा करते हुए बताया कि सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पूर्व निर्णय को वापस लेना सम्भव नहीं परन्तु उसके क्रियान्वयन पर अवश्य बदलाव किया जा सकता हैं
डॉ. अनिल दीक्षित नें सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि, चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने आदेश दिया कि जिन हाईकोर्टों ने पहले ही सिविल जज (जूनियर डिवीजन) पदों के लिए विज्ञापन जारी कर दिया है, वे आवेदन की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाएं। साथ ही भविष्य में जारी होने वाले नए विज्ञापनों में भी यही अंतिम तिथि निर्धारित की जाए। अदालत को बताया गया कि कुछ राज्यों में भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पर कोर्ट ने कहा कि समीक्षा याचिकाओं पर अगले सप्ताह सुनवाई की जाएगी और आवेदन की तारीख बढ़ाने से फिलहाल उम्मीदवारों की तात्कालिक समस्या दूर हो जाएगी। हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद द्वारा प्रैक्टिस की अनिवार्यता को फिलहाल स्थगित करने की मांग को अदालत ने स्वीकार नहीं किया।
सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त सुप्रीम कोर्ट के फैसले से तय हुई है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। अब सवाल केवल यह है कि इसे लागू करने की प्रक्रिया (modalities) क्या हो। उन्होंने कहा कि प्रैक्टिस की शर्त का उद्देश्य यह है कि उम्मीदवार अदालतों के कामकाज का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करें। सीजेआई ने कहा, “हम चाहते हैं कि न्यायिक सेवा में थोड़ा परिपक्व (mature) व्यक्ति आए।” उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ अदालतों में बैठकर समय बिताने से प्रैक्टिस का उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि उम्मीदवारों को वास्तविक अनुभव प्राप्त करना चाहिए। सुनवाई के दौरान जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने टिप्पणी की कि प्रैक्टिस की शर्त हटाने की मांग मुख्य रूप से कोचिंग संस्थानों के प्रभाव के कारण उठाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यह अनुभव के आधार पर कही जा रही बात है और न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के पास अदालत का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।
ज्ञात हो कि, यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 20 मई 2025 के फैसले से जुड़ा है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया था कि निचली न्यायिक सेवा में भर्ती के लिए उम्मीदवारों के पास कम से कम तीन साल का वकालत का अनुभव होना चाहिए। इससे पहले 2002 में इस शर्त को हटाकर नए कानून स्नातकों को सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा देने की अनुमति दी गई थी। समीक्षा याचिकाओं में दलील दी गई है कि यह शर्त नए कानून स्नातकों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तथा गैर-लिटिगेशन क्षेत्रों (जैसे लॉ फर्म, कॉर्पोरेट या पीएसयू) में काम करने वाले वकीलों के लिए असमान रूप से बाधा पैदा करती है।
कुछ याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि कानून की पढ़ाई के दौरान इंटर्नशिप और न्यायिक प्रशिक्षण पहले से ही पर्याप्त अनुभव प्रदान करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में इन समीक्षा याचिकाओं को खुली अदालत में सुनने का फैसला किया था, जो सामान्य प्रक्रिया से अलग है।
*डॉ. दीक्षित नें बताया क़ि, अब सुप्रीमकोर्ट द्वारा इस पर विस्तृत सुनवाई अगले सप्ताह की जाएगी।*
