बुंदेलखंड की मिट्टी: संभावनाओं का खज़ाना, चुनौतियों का सामना

झांसी।
बुंदेलखंड क्षेत्र की मिट्टी मुख्यतः विंध्यन चट्टानों से उत्पन्न होती है और यहां चार प्रमुख प्रकार—काबर, मार, परवा और राकर—पाई जाती हैं। यह मिट्टी अपनी बनावट और पोषण तत्वों के कारण खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। गेहूं, चना, मसूर और तिलहन जैसी फसलें यहां अच्छी उपज देती हैं। इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे आवश्यक पोषक तत्व मौजूद हैं, साथ ही मध्यम जल धारण क्षमता किसानों को स्थिर उत्पादन का अवसर देती है।

कमियां और चुनौतियां

हालांकि, बुंदेलखंड की मिट्टी कई गंभीर समस्याओं से जूझ रही है:

मिट्टी का क्षरण: जल और वायु के कारण तेजी से क्षरण होता है, जिससे उर्वरता घटती है।

पोषक तत्वों की कमी: मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ और आवश्यक तत्वों की कमी पाई जाती है।

कम जल धारण क्षमता: बरसात के पानी का संरक्षण न हो पाने से फसलों को सूखे के समय नमी नहीं मिल पाती।

अम्लता की समस्या: कुछ क्षेत्रों में मिट्टी की अम्लता भी फसलों की वृद्धि को प्रभावित करती है।

इन चुनौतियों का सीधा असर फसल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ता है।

समाधान के उपाय

विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि सही कदम उठाए जाएं तो बुंदेलखंड की मिट्टी को अधिक उपजाऊ और टिकाऊ बनाया जा सकता है:

वृक्षारोपण और मेड़बंदी: इनसे मिट्टी का क्षरण 40–50% तक कम किया जा सकता है।

जल संचयन: तालाब, कुएं और चेक डैम जैसे संरचनाओं से पानी को सुरक्षित कर फसलों को नियमित सिंचाई उपलब्ध कराई जा सकती है।

जैविक खाद का उपयोग: गोबर की खाद और हरी खाद से मिट्टी की पोषण क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

पुनर्योजी कृषि: आवरण फसल, मल्चिंग और फसल चक्र जैसी तकनीकें मिट्टी में नमी और उर्वरता बनाए रखने में सहायक हैं।

अम्लता प्रबंधन: चूना और क्षारीय पदार्थ डालकर मिट्टी की अम्लता को संतुलित किया जा सकता है।

सफल प्रयासों के उदाहरण

बुंदेलखंड के कई जिलों में मिट्टी उपचार और कृषि सुधार के सफल प्रयोग किए गए हैं:

सागर जिला: कृषि अनुसंधान केंद्र द्वारा सूरजमुखी की खेती का सफल प्रयोग किया गया, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ी।

टीकमगढ़ और दमोह: जल संचयन संरचनाओं और वृक्षारोपण के प्रयोग से मिट्टी संरक्षण में उल्लेखनीय सफलता मिली।

झांसी और हमीरपुर: जैविक खाद और फसल विविधिकरण के प्रयोग से उत्पादकता बढ़ी है।

निष्कर्ष

बुंदेलखंड की मिट्टी संभावनाओं से भरपूर है, लेकिन इसकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। यदि वैज्ञानिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक प्रयासों को मिलाकर काम किया जाए, तो यह क्षेत्र न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि देश की खाद्यान्न सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

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