नई दिल्ली 15 मार्चः देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मोदी का सटीक मैनेजमेट और भाजपा मे पीएम पद का उम्मीदवार बनने के बाद देश मे उनके नाम को लेकर लोगो मे जो बुखार चढ़ा, उस कद काठी की तलाश के रूप मे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को देखा जाने लगा था। पर, यूपी मे दो लोकसभा सीट गंवाने के बाद फिल्म मे जबरदस्त सस्पेन्स आ गया है।
वैसे यूपी के चुनाव के नतीजे योगी और मोदी दोनो के लिये अच्छे और बुरे नजरिये के हैं। मोदी के विकल्प के रूप मे पार्टी मे उभर रहे योगी गोरखपुर की सीट हारने के बाद पार्टी के सामने अपने आप नतमस्तक हो गये। वहीं मोदी को समझ मे आ गया कि लहर के साथ जमीन पर दिखना और विपक्ष को एकजुट होने से रोकना उनके लिये जरूरी है।
मोदी के लिए यह हार अच्छी और बुरी खबर, दोनों ही रूपों में देखी जाएगी. अच्छी इसलिए कि उनके उत्तराधिकारी बनने की महात्वाकांक्षा रखने वाला योगी अपने ही गढ़ में घुटनों के बल बैठ गया है. इस तरह योगी के बढ़ते कद को मोदी ने फिर से छोटा कर दिया है. योगी का संकट भी यही है कि गोरखपुर से निकलकर न तो गोरखपुर पूरी तरह से उनके नियंत्रण में है और न ही लखनऊ की गद्दी वो भलीभांति संभाल पा रहे हैं. हिंदू युवा वाहिनी एक साल के भीतर ही कमज़ोर पड़ने लगी है. गोरखपुर में उपचुनाव की हार उनकी इस कमज़ोर स्थिति का प्रमाण बन गई है. मोदी के लिए यह अच्छी खबर है
लेकिन मोदी के लिए यह बुरी खबर इसलिए है कि त्रिपुरा की जीत का गुलाल फीका पड़ने से पहले ही इन उपचुनावों की हार ने भाजपा को ज़मीन पर पटक दिया है. गुजरात की फीकी जीत के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और अब उत्तर प्रदेश, बिहार के उपचुनावों में भाजपा की हार से मोदी के जादू का तिलिस्म कमज़ोर पड़ता नज़र आ रहा है. कम से कम आम मतदाता तो इसे इसी रूप में देखेगा. कर्नाटक में भी उपचुनाव के इस संदेश को इसी तरह से मतदाता पढ़ेगा. और ऐसा होना मोदी के लिए कतई अच्छा संकेत नहीं है. अगर यह सिलसिला ऐसे ही बढ़ा तो 2019 में अपनी हवा को बनाए रख पाना मोदी के लिए खासा मुश्किल होगा.
दरअसल, इन परिणामों के बाद मोदी यह ज़रूर सोचेंगे कि जनता पर जादू के लिए उन्हें अब क्या नए रास्ते अख्तियार करने की ज़रूरत है. क्योंकि वो भी ये देख पा रहे होंगे कि जादू के पुराने खेल अब जनता को लुभाने वाले नहीं हैं. जनता जादू के सापेक्ष चार साल के उनके प्रदर्शन को रखकर मुल्यांकन करेगी और देखेगी कि क्या वाकई बड़ी बातों वाला नेता बड़े काम कर पा रहा है. उपचुनावों के नतीजे इसी मुल्यांकन की भाप में भरे नज़र आते हैं.
