झांसीः पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीपजैन आदित्य के खिलाफ प्रेमनगर थाने मे दर्ज हुये मुकदमे के बाद सवाल उठ रहे है कि क्या जनता की आवाज उठाने पर उनका हौसला तोड़ने की साजिश रची जा रही है? क्या बीजेपी प्रदीप जैन की लोकप्रियता से घबरा गयी है? मुकदमा दर्ज होने के बाद जनता भी इसे गलत मान रही है।
बता दें कि 5 जून को झांसी के प्रेमनगर थाना क्षेत्र में सुनील साहू नाम के व्यक्ति की मौत हो गई थी। मृतक के परिजन शव को थाने के बाहर रखकर प्रर्दशन कर रहे थे। उनका आरोप था कि दरोगा बलवीर अपने दो सिपाहियों के साथ उसके घर पहुंचे थे। जहां उन्होंने 50 हजार रुपयों की मांग की। जिसे पूरा करने पर पुलिस ने सुनील साहू के साथ मारपीट कर 60 हजार रुपए लूटकर चले गये थे।
पुलिस की पिटाई से सुनील साहू की मौत हो गई थी। मृतक के परिजनों ने उक्त पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज कराने की मांग करते हुए प्रर्दशन किया। जिसमें कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य, शहर अध्यक्ष इम्त्यिाज हुसैन व सत्ताधारी पार्टी के पूर्व शिक्षा मंत्री रविन्द्र शुक्ल और महानगर अध्यक्ष प्रदीप सरावगी मौके पर पहुंचे थे। लगभग 4 घंटे प्रर्दशन के बाद पुलिस ने आरोपी दरोगा और पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था। मामला दर्ज होने के बाद परिजनों ने शव को उठने दिया था।
इसके बाद दूसरे दिन प्रेमनगर थाना प्रभारी अवध नारायण पांडे ने कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य समेत 250 लोगों के खिलाफ धारा 147,149,157,152,186,189,332,341,353,395 व 3 यूपी लोक सम्पति निवारण अधिनियम के तहत मुकद्मा दर्ज कराया। थानेदार ने आरोप है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य समेत सभी लोगों ने थाने का घेराव करते हुए तोड़फोड़ करते हुए सरकारी कार्य में वाधा डाली। इतना हीं नहीं उन्होंने एक महिला सिपाही के साथ मारपीट करते हुए वर्दी फाडते हुए सोने पैंडल लूट लिया था।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राजनैतिक व्यक्तियो मे पुलिस को केवल प्रदीप जैन दिखायी दिये, जबकि बीजेपी के नेता भी वहां थे। ताज्जुब तो इस बात का है कि पुलिस ने पीड़ित परिवार के लोगो के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया है।
प्रदीप जैन आदित्य के खिलाफ दर्ज हुये मुकदमे को लेकर राजनैतिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं भी आने लगी है। कांग्रेस ने इसे राजनैतिक साजिश करार दिया है। कांग्रेसियो का कहना है कि प्रदीप जैन का जनता से जुड़ाव बीजेपी को हजम नहीं हो रहा। यही कारण है कि उनके खिलाफ पुलिस कार्यवाही की जा रही है। वहीं सामाजिक संगठनो ने भी प्रदीप जैन आदित्य पर दर्ज हुये मुकदमे को गलत बताया है।
वरिष्ठ समाजसेवी हरी प्रकाश का कहना है कि जनता की समस्या को जानने और समझने व सुलझाने के लिये नेता मौके पर पहुंचते हैं। यदि उनके खिलाफ ही पुलिस कार्यवाही होने लगी, तो आम आदमी का क्या होगा?
अधिवक्ता अनिल का कहना है कि किसी भी राजनेता की कभी मंशा नहीं होती कि सरकारी संपति को नुकसान पहुंचे या जनता के गुस्से को और बढ़ाया जाए। इस प्रकरण मे पूरी तरह से राजनैतिक दृष्टिकोण नजर आ रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस ने राजनैतिक दवाब मे प्रदीप जैन के खिलाफ मामला दर्ज किया। अब उनकी तलाश कर रही है।
खबर है कि उन्हे गिरफतार करने के लिये पुलिस उनके घर भी पहुंची। प्रदीप जैन आदित्य खुद कहते है कि जनता की आवाज उठाने पर बीजेपी उन्हे परेशान करने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। पुलिस की कार्यवाही निपष्क्ष नहीं है। पीड़ित परिवार को भी मुकदमे का दंश झेलना पड़ रहा है।
झांसी मे कानून को मनमाने तरीके से संचालित किया जा रहा है। प्रदीप कहते है कि कानून से खिलावाड़ का उदाहरण इससे समझा जा सकता है कि उनके विधायक ही मान रहे है कि जनपद मे अवैध कारोबार चरम पर है। पुलिस इस कारोबार पर लगाम लगाने की जगह बीजेपी के राजनैतिक प्रतिद्वंदियो को निपटाने का काम कर रही है!
आदित्य ने कहा कि उन पर और जनता पर जो मुकद्मा लिखा गया है। वह गलत है। सीसीटीवी दिखा लिये जाये। यदि उन्होंने किसी भी सिपाही के साथ अभद्रता और मारपीट व लूटपाट की है तो वह फांसी पर भी चढ़ने को तैयार हैं। थाने के बाहर बड़ी संख्या में लोग बैठकर शव को रखकर प्रर्दशन कर रहे थे। घटना के तीन घंटे बाद वह वहां वहां पहुंचे और भीड़ को समझाने का प्रयास किया। पीड़ितों का आरोप था कि मृतक की पुलिस उत्पीड़न से मौत हुई है। ऐसा नहीं है कि यहां वह अकेले हो।
उनके अलावा भाजपा से पूर्व शिक्षा मंत्री रविन्द्र शुक्ल समेत अन्य भी मौजदू थे। सभी ने उस तनावपूर्ण स्थिति को खत्म कराने का प्रयास किया था। सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि सइयां भए कोतवाल तो फिर डर काहे का। जिसकी लाठी उसकी भैंस।
भारतीय जनता पार्टी की सरकार है वह जैसा करना चाहे वैसा कर सकती है। अंग्रेजों के शासन में देखते थे कि किस तरह जलिया वाला कांड हुआ था और किस प्रकार बेगुनाहों की आवाज को दबाया गया था। ठीक उसी प्रकार का दौर आज सामने आया है। जब गरीब अपनी आवाज उठाने जाते है तो प्रशासन उन पर संगीन और खतरनाक धाराओं में मामला दर्ज कर आवाज दबाने का प्रयास करता है। वह निर्दोशों के साथ कानूनी लड़ाई लड़ेगें। वह उच्चाधिकारियों से आस रखते है कि वह इसकी सीबीआई जांच करायेंगे।
