नई दिल्ली 16 मार्च। लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच हुए गठबंधन की चुनावी रैलियां तय हो गई है, लेकिन इन 11 रैलियों में से नौ साझा रैलियां समाजवादी पार्टी के गढ़ में होने को लेकर राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हैं। वैसे जानकारी मांग रहे हैं कि समाजवादी पार्टी गठबंधन के बाद मायावती की ताकत का अपने क्षेत्र में प्रयोग भी करके देखना चाहती है।
हालांकि सांझा रैलियों के बारे में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता सुनील साजन का कहना है कि सांझा रैली के लिए स्थलों का चयन भौगोलिक परिस्थिति को देखकर तय किया गया है । भले ही 11 में से 9 समाजवादी पार्टी के क्षेत्र में की जा रही हो, लेकिन अगल बगल की सीटों पर बहुजन समाज पार्टी चुनाव लड़ रही है । जरूरत पड़ी तो अलग से भी सांझा रैलियां की जा सकती है
फिलहाल सपा और बसपा की रैलियों को लेकर कार्यकर्ताओं में कितना जोश है, यह तो रैली के समय ही पता चल सकेगा, लेकिन इतना तय हो चुका है कि समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ अब मायावती की ताकत को सबसे पहले अपने ही घर में आजमा लेना चाहती है।
गठबंधन की ओर से घोषित कार्यक्रम के अनुसार समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और आरएलडी के अजीत सिंह की सांझा रैलियों की शुरुआत नवरात्रों के दिनों में 7 अप्रैल से होगी।
गठबंधन की ओर से की जा रही साझा रैलियों में मैनपुरी, कन्नौज, बदायूं, फिरोजाबाद और आजमगढ़ वो सीटें हैं जो फिलहाल यादव परिवार के पास हैं और आधी साझा रैलियां इन्हीं सीटों पर हो रही हैं. 11 साझा रैलियों में से सहारनपुर और आगरा महज दो ऐसी सीटें हैं जो बीएसपी के कोटे में है, लेकिन 80 फीसदी से ज्यादा रैलियां सपा के गढ़ में करने की वजह आखिर क्या है?
साझा रैलियों को लेकर बीजेपी की ओर से कहा जा रहा है कि अखिलेश यादव की हताशा और चुनाव का खौफ है। वह मायावती को अपने और परिवार के इलाके में रैलियां कराने के लिए मजबूर कर रहा है। सपा की हालत यह है कि वह हर हाल में कम से कम अपने परिवार की सीट बचाना चाहती है और इसके लिए आधे से ज्यादा रैलियां समाजवादी पार्टी के इलाके में हो रही हैं।
रामपुर, फैजाबाद, गोरखपुर, वाराणसी, सहारनपुर और आगरा ऐसी सीटे हैं जो यादव परिवार से बाहर हैं, लेकिन आखिर सिर्फ सपा के लिए मायावती का कैंपेन करना क्या संदेश देता है?
