दर्द उम्र का सह लिया, अपनो की बेरूखी बर्दाश्त नहीं होती

झांसीः

 

झांसी: हम वीरो  की कुर्बानी के चलते आजादी की इस खुली हवा मे  सांस ले रहे हैं, लेकिन आजादी की इस भूलभुलैया मे  हम रिश्तो  को संवारना भूल गये हैं। आधुनिक जीवन शैली मे  नयी पीढ़ी उम्रदराज लोगो  की देखभाल से परहेज क्यो कर रही, यह सवाल बना हुआ है। यही कारण है कि आजादी के बाद भी बूढ़े-बुजुर्गों की जिन्दगी मे  अपने हाल से लड़ने का दौर खत्म नहीं हुआ है। अपनो  और समाज की उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। जिन्दगी को अनुभव के साथ दिषा देने वाले खुद दिशा विहीन हैं। सवाल यह है कि क्या इन्हंे दुखी जीवन से मुक्ति मिल सकेगी या नहीं?

देश और समाज को अपने जीवनकाल मे  सेवा देने के बाद रिटायर होने पर अधिकांश बुजुर्ग उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं। कुछ गरीबी के चलते तो कुछ अपनो  के तानेबाने को लेकर जिन्दगी का रस भूल जाते हैं।

उम्र के आखिरी पड़ाव मे  यह पीड़ा बहुत दुखदायी होती है। रोटी के लिये भीख और दया का पात्र हाथ मे  होने से साफ समझा जा सकता है कि बुजुर्ग किस हाल मे  होंगे।

वैसे तो सरकार और स्वयं सेवी संगठन समाज के बुजुर्गों की सेवा के लिये योजनाये  और सहयोग के कार्यक्रम आयोजित करते हैं, लेकिन इनकी उपयोगिता किन बुजुर्गों के खाते मे  जाती यह कोई नहीं जानता। अपनो  की पुण्यतिथि हो या फिर क्लबो  की बैठकंे। समाज मे  अपनी कालर उंची करने वालो  के हाथ फल, कपड़े आ जाते हैं। यह वस्तुयंे एक दिन के लिये होती हैं।इसके बाद दीनदुःखी उम्रदराज लोग क्या करंेगे, यह कोई नहीं कह सकता।

नगर मे  वृद्वजनो  के लिये आश्रम और रैन बसेरा तक नहीं है। सड़क पर बैठे इन बुजुर्गों के लिये होली, दीवाली और आजादी के जश्न का कोई मतलब नहीं। दुख इस बात का है कि जिस उम्र मे  शरीर के अंग अपने लिये बोझ लगने लगे, उस समय इन बेसहारा वृद्वांे को भोजन, पानी और रास्ता तय करते हुये जिन्दगी के लम्हो  को काटना पड़ता है। इन बुजुर्गों की संख्या इतनी भी नहीं है कि इन्हे  संभाला न जा सके। पर, सवाल यह है कि कौन इनके दर्द को समझे? वहीं किसी राजनेता या समाज के प्रतिस्ठित व्यक्ति को सहारा देने की बात आये तो हमदर्दां का पूरा कुनबा सड़क पर उतर आयेगा। क्या इसी बात की आजादी के लिये हमारी वीरो  ने कुर्बानी दी थी?

 

 

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