झांसीः बेड़ियां हमने अपने हाथ मे स्वार्थ की इस कदर जकड़ रखी है, गुलाम होने की आदत से बाहर कैसे निकले? जीहां, यह सौ फीसद सच है कि झांसीराइट अपनी आदत के चलते अच्छा करने की दिशा मे आगे नहीं बढ़ पाते। यही कारण है कि स्मार्ट सिटी की कल्पना के पहले कदम मे बाजार को सुन्दर बनाने की पहल मे किसी को नंबर वन का स्थान नहीं मिल सका। अब तक सारी कवायद बेकार साबित हो रही हैं।
हम दौड़ते हैं, भागते हैं। बाजार मे रेलमपेल देखते हैं। फिर चीखते है कि बहुत कष्ट होता है। लेकिन सुधर नहीं सकते। आप हो या हम। दोनो की अपने सुख और सीमित सोच के दायरे से बाहर नहीं आ पा रहे।
बाजार की गलियां तंग हो गयी है। दुकान की हद सड़क से जा मिली है। अधिरकारियो से लेकर व्यापारी नेतओ को सब नजर आता है, लेकिन आंख पर पटटी बांध ली है। कहते है कि जब देखेगे नहीं, तो कार्रवाई क्या खाक करेगे। अजी छोड़िए, आपको तो बहाना चाहिये। सीधा क्यो नहीं कहते कि बड़े लोग आपसे कार्रवाई के लिये नहीं कहते? क्या सीएम के आने पर सड़क से वाहन आड़े तिरछे खड़े होने का नजारा गधे के सिर से सिंग की तरह गायब नहीं हो जाते? क्या सड़क चमचमा नहीं उठती? फिर ऐसा क्या है कि एक महीने से चल रही बाजार को सुधारने की कवायद मे डीएम एक दिन के लिये बाजार का रूख नहीं कर पाये।
चलो मान लेते है कि डीएम साहब, जिले के अधिकारी है। तमाम कार्य की फाइल मे उलझे रहते हैं। जनप्रनिधि और व्यापारी नेता किस फाइल मे उलझे हैं। उन्हंे कौन सा काम चोबीस घंटे घेरे रहता है।
फोटो सेशन या समारोह मे बोलने का मौका दो, देखो जनप्रतिनिधि और व्यापारी नेता कैसे लपक कर मंच संभालते हैं। बड़ी-बड़ी बाते करेगे। दावे करेगे। प्रोत्साहन की चासनी फैलाएंगे। इसके बाद घर जाकर सो जाएंगे। क्या यही है नगर के विकास का पैमाना?
नगर जैम में फंसा है। लोग परेशान है। छोटे अधिकारी पर सभी का दवाब है। ऐसे मे बड़े अपनी मस्ती मे है। कब तक? कैसे सुधरेगे नगर के हालात। कैसे बनेगा बाजार स्मार्ट? व्यापारी नेता जैसे अधिकारियो के बोल के गुलाम हो गये हंै! जनप्रतिनिधि सो रहे हैं। अब भगवान ही मालिक है। हद मंे रहने वाले दुकानदार सुधरने का नाम नहीं ले रहे। बताओ, किसे दोष दे? इन हालात मे यही कहा जा सकता कि सुधारने की प्रतियोगिता कराते रहो और इंतजार करो कि कोई मसीहा प्रथम आने की कोशिश मे आगे आएगा।
