झांसीः भाजपा नेता एडवोकेट सुधीर सिंह को अरबन बैंक का सभापति बनने से रोकने की पटकथा कैसे लिखी गयी, यह हम आपको बता रहे हैं। इस पटकथा को जानने के बाद आप हैरान रह जाएंगे।
बुन्देली राजनीति उस मोड पर खड़ी है, जहां कददावर नेताओ के आगे आज भी दूसरी पक्ति के नेता बौने हैं। पहले से कद बना चुके नेताओ ने अपने को आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक तौर पर इतना मजबूत कर लिया है कि सत्ता मे रहे या ना रहे, वो मनचाहा फल पाने मे कामयाब हो जाते हैं।
बुन्देली राजनीति मे बड़े नेताओ की यह मनमर्जी विकास को अंधे रास्ते पर धकेल रही है। चाहे वो भाजपा के नेता हो या फिर सपा के। अपने रसूख और कद को उंचा रखने की तिकड़म मे का जाल बुनने मे माहिर इन नेताओ के दबदबे की झलक कल हुये अरबन बैंक के सभापति के चुनाव मे देखने को मिली।
सभापति पद के लिये प्रमुखता से दो दावेदार थे। भाजपा के सुधीर सिंह और सपा के वीरेन्द्र सिंह यादव। कहते है कि सत्ता के लिये सभी झुकते है। सो, भाजपा को पूरी उम्मीद थी कि बाजी उनके हाथ रहेगी। हो भी क्यो नहीं। बाजी हाथ रखने के लिये जरूरी वोट से कहीं ज्यादा संख्या बल था। फिर बाजी पलट कैसे गयी?
यह सवाल पहले किसी के दिमाग मे नहीं आया। जब रिजल्ट देखा, तब अपनो के परायो को अंदरूनी समर्थन और पार्टी के अंदर से ईमानदार को पीछे धकेलने की जुगाडू राजनीति की कहानी सामने आयी।
जनकार बता रहे है कि जिस समय सभापति के लिये मतदान हुआ, तब सुधीर के पास वोट बल की संख्या 7 थी। उत्साह के साथ अपनो के भरोसे से लबरेज सुधीर अंतिम दौर तक सभी को संभाले रखने का प्रयास करते रहे। बाजी हाथ आने की पूरी तैयारी थी। चार वोट पड़ चुके थे। पांचवा सुधीर का था। दो सुधीर के पास थे। यानि जब वोट की गिनती होगी, तब संख्या बल सात रहेगा। इस कहानी मे डूबे सुधीर की पटकथा को अचानक बंगले से आये एक फोन ने पलट दिया।
किस्मत और अपनो का साथ भी सुधीर के पाले से अचानक ऐसे निकला, जैसे आसमान से ब्रजपात हो गया हो। चुनाव से पहले रात मे वोट देने का दावा करने वाले एक सदस्य बंगले के फोन की हवा मे ऐसे हिला कि शरणागत होते हुये सीधी चाल को छोड़ राजनैतिक परिपक्वता का परिचय देने मे माहिर साबित हो गया।
जिस सदस्य को सुधीर दोस्ती का वास्ता देकर और सदस्य भी बंगले के दबाव को नकार कर साथ निभाने की कसम खा रहा था, अंत मे बिक गया या कहे दूसरे पलड़े मे जा बैठा। यह भी ठीक था। अभी भी बाजी सुधीर के पाले मे थी। पर, सितम देखिये। पराया तो दगा दे सकता है, अपने भी अंदर से छुरी चलाने की कला मे महारत दिखाने से बाज नहीं आये। अपने ने ऐसा झटका दिया कि सुधीर को टाई की स्थिति मे ला खड़ा किया।
पर्दे के पीछे बंगले से लिखी गयी इस पटकथा मे भाजपा के नेताओ ने अपनो का साथ ना देकर साबित कर दिया कि राजनीति कभी अपनो के लिये नहीं होती। पैसा, पावर और शरणागत करने वाले ही सफलता को प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि बड़े नेताओ को इस बात की तनिक भी फिक्र नहीं कि लोगो तक विकास पहुंचे या ना पहुंचे। अपनी हनक और कालर उंची रहे, इसके लिये कुछ भी करने की रणनीति वाली राजनीति बुन्देली माटी मे ईमानदार पहल का स्वागत नहीं होने दे रही?
