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झांसी मे इस बचपन की कोई कीमत नहीं!

झांसीः यह मासूम है, लेकिन लत ऐसी लगी कि खौफनाक बन गये हैं। उन्हे जिन्दगी का ककहरा भी नहीं पता, शौक पूरा ना हो, किसी की भी जिन्दगी छीन ले। बेकसूर और बेपरवाह बचपन सड़क पर बेमतलब जी रहा है। क्या यह सब प्रायोजित है? क्या वाकई इन्हे ऐसी ही जिन्दगी जीने की आदत है? कौन है यह बचपन? आखिर झांसी मे आता कहां से है ?

आपके दिमाग मे भी ऐसे सवाल कौंधते होगे, जब आप सड़क पर मैलेकुचेले कपड़ा मे लिपटा वो बालक देखते होगे, जिसके कंधे पर गंदा थैला और हाथ मे मैला कपड़ा रूमाल सा बना होगा।

यह रूमाल सा बना कपड़ा वो बालक, किशोर चंद पल के बाद अपने मुंह से लगाता है और गहरी सांस लेता है। बेफिक्र और बेबाकी से सड़क पर टहलता है। सामान बटोरता है। जेब मे आये पैसे से सुलोचन जैसे टयूब खरीददाता है। इनका मकसद क्या है? कौन है जो इन्हे सड़क पर ऐसा करने को मजबूर करता ह? इनका भाग्य या बेबसी?

दरअसल, झांसी ही नहीं पूरे प्रदेश या कहे देश मे ऐसे गरीब तबके के लोगो की भीड़ है। शब्द की दुनिया से दूर बेफिक्री की जिन्दगी के गुलाम इन कथित बचपने से लेकर किशोरो  की भीड़ सिर्फ अपनी जिन्दगी को चंद सांस नशे मे लपेटने के लिये बेताब है। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, चैराहा। जी हां, इनकी जिन्दगी की धुरी केवल इन्हीं स्थानो  पर घूमती है।

यहां भीड़ मे पैसा और मुफत का भोजन मिल जाता है। इनके पास आये पैसो का इनके पास हिसाब रहता हो, यह पता नहीं।

इनकी असल जिन्दगी की शाम रात ढ़लने पर होती है। बेसुध होने से पहले झगड़ा, मारपीट और गाली गलौच के दौर का आलम कई घंटे तक चलता है। इन्हे किसी संगठन, सरकार और नेताओ  की मेहरबानी या दया की छाया कभी अपने आगोश मे नहीं लेती। भारत जैसे तरक्की मुल्क मे बचपन को नशा की लाठी पकड़ाकर उन्हे बदनसीब करार देने और अपना उल्लू सीधा करने वाले शायद कभी बेनकाब हो!

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