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झांसी-क्या कद और काठी मे उलझ रहा महापौर चुनाव!

झांसीः चुनावी यज्ञ की तैयारी पूरी हो गयी हैं। नगर निगम झंासी चुनाव मे  मेयर और सभासद के लिये दावेदार ताल ठांेकने को तैयार हैं। एक रोचक पहलू इस चुनाव मे  यह उभर रहा है कि पहली बार बड़े चेहरो के इर्दगिर्द चुनावी समीकरण बनते नजर आ रहे हैं। इसमे  विकास का मामला कहां रहेगा, यह सवाल है।

वैसे तो, झांसी की हर सीट पर बीजेपी जीत का दावा करती है। परंपरागत सीट मानकर चलने वाली बीजेपी को इस बार बड़े चेहरो  ने ऐसी चुनौती दी कि प्रत्याशी के चयन मे  भाजपाईयो  को सर्दी मे  भी पसीने छूट रहे हैं। लखनउ मे  प्रत्याशी चुनने को लेकर मंथन चल रहा है। सवाल यह उठ रहा कि क्या भाजपा के पास ऐसा चेहरा नहीं है जो इन चेहरो  का मुकाबला करने मे  समर्थ हो।

क्यो दावेदारो मे  से कुछ बाहर हो रहे हैं? इससे इतर एक स्थिति यह भी बन गयी है कि क्या पूर्व विधायक बृजेन्द्र व्यास और पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य के चेहरे विकास के मुददे को नयी दिशा देने मे  कामयाब होगे। यदि प्रदीप जैन की बात करे, तो वो विकास की परिभाषा मे  अपनी गणित कुछ इस तरह बताते हैं।

प्रदीप जैन का कहना है कि नगर निगम की करोड़ांे रूपयो  की नजूल की भूमि कब्जे मे  हैं। उसे किसी ने छुड़ाने का प्रयास नहीं किया। पार्क ऐसे नहीं है, जिनहे घूमने लायक माना जा सके।पिछले कई दशको  से नगर के विकास को लेकर रोड मैप तैयार नहीं किया गया। प्रदीप सवाल दागते है कि क्या आज हम महानगर मे  रहने के बाद भी किसी प्रकार की सुविधा वाले बन पाये हैं?

मसलन, नगर मे  एक भी अंडरग्राउंड पार्किंग स्थल नहीं है?गृहकर को लेकर आम आदमी परेशान हैं। झांसी का स्वरूप बनाने वाला नगर निगम अपने लिये ही कोई प्लान तैयार नहीं कर पाया।प्रदीप के विकास के विजन से इतर दूसरे प्रत्याशी खामोश और दल की दावेदारी मे  उलझे हैं।

चाहे वो डमडम हो या फिर दूसरे। वैसे विकास के मामले मे  भारतीय प्रजाशक्ति अपना अलग ही दावा पेश कर रही है। बीपीएसपी की माने तो वो अकेली ऐसी पार्टी है, जो शुरू से ही नगर के विकास का मुददा उठा रही है।अलबत्ता पार्टी का चेहरा बड़ा नहीं होने से दिक्कते तो तमाम हैं। इधर, निर्दलीय प्रत्याशियो  मे  राम कुमार अंकशास्त्री अपनी जबरदस्त स्कीम के साथ मैदान मे  हैं। वो विकास के साथ रोजगार का दावा कर रहे हैं।

करीब पांच हजार युवाओ  को नौकरी देने का वादा। अभी तक जो स्थिति निर्मित हो रही हैं, उसमें चर्चा केवल चेहरों पर जा टिकी है। यकीन मानिये यह चर्चा अंतिम दौर तक चलेगी।

बस, कोशिश रहेगी कि इस चर्चा मे  विकास शामिल हो जाए?

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