झांसी: विज्ञान का अध्ययन मातृभाषाओं में करने से देश का बहुआयामी लाभ : प्रो अविनाश चंद्र पाण्डेय

झांसी। आईयूएसी के निदेशक प्रो अविनाश चंद्र पाण्डेय ने कहा कि विज्ञान की विविध विधाओं का अध्ययन मातृभाषाओं में करने से देश का बहुआयामी विकास और लाभ होगा। ऐसा करके हम अपने देश के डाटा को भी सुरक्षित रखने में सक्षम होंगे। उन्होंने यह विचार शुक्रवार को यहां बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के गांधी सभागार में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए।
प्रो पाण्डेय ने कहा कि प्रो जगदीश चंद्र बोस ने अपनी अनुभूति के आधार पर तमाम महत्वपूर्ण शोध किए्। उन्होंने कहा कि ज्ञान अर्जित करने के तीन स्तर हैं। पहला इग्नोरेंस। दूसरा सीखना यानी आपने कुछ सीख लिया। तीसरा बुद्धिमत्ता प्राप्त करना यानी अनुभव करना। एक चित्रकार का उदाहरण देकर उन्होंने समझाया कि कैसे उसने एक अप्रतिम चित्र तब बनाया जब कोई परीक्षक सामने नहीं था। जेसी बोस के जीवन के कई प्रसंगों का उल्लेख भी उन्होंने किया। प्रो पाण्डेय ने कहा कि सत्य का उद्घाटन और सत्य के साथ साक्षात्कार ही विज्ञान है। यदि आप अपनी भाषा में सत्य का साक्षात्कार करते हैं तो इसमें विकास की असीमित संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत वर्ष में अनेक योजनाएं चल रही हैं ताकि हम विज्ञान के विकास में अपनी मातृभाषाओं में काम करें। उन्होंने कहा कि हम जीवन को सुगम बनाने के लिए मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। हम तमाम गोपनीयताएं बरतते हैं लेकिन हमारा डाटा गोपनीय नहीं रह जाता है जबकि देश के डाटा की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि हम आज जहां पहुंचे हैं उसमें महापुरुषों का अहम योगदान है। मस्तिष्क के सिग्नेचर भी अब पढ़े जा रहे हैं। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों से समझाया कि मातृभाषा में विज्ञान का प्रसार और विकास बहुत अच्छे ढंग से किया जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो मुकेश पाण्डेय ने
कहां कि यह सम्मेलन ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति का प्रारंभ है। उन्होंने उम्मीद जताई कि वैज्ञानिक प्रयोगों को गांव गांव तक पहुंचाने में विज्ञान भारती अहम भूमिका निभाएगी। उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम का उल्लेख करते हुए कहा कि हम मानते हैं कि पूरा विश्व हमारा परिवार है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की विशिष्टताओं का उल्लेख किया। हमारी संस्कृति कहती हैं कि प्रकृति का शोषण नहीं संरक्षण करो। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने का प्रावधान किया गया है। प्रो पाण्डेय ने कहा कि युवाओं की सोच को विकसित करने में यह सम्मेलन महत्वपूर्ण साबित होगा। उन्होंने उम्मीद जताई की कि भारत सन 2047तक विश्व गुरु बनेगा। उन्होंने सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियों से रानी लक्ष्मीबाई को भी याद किया। साथ ही साथ अन्य महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया। प्रो पाण्डेय ने उम्मीद जताई की कि यह सम्मेलन विज्ञान जगत को लाभान्वित करेगा।
यह सम्मेलन विज्ञान भारती,बुविवि, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय,झांसी, अल्ट्रासोनिक सोसाइटी आफ इंडिया और उत्तर प्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया है।
डा कैलाश विश्वकर्मा को आचार्य डा प्रफुल्ल चंद्र राय विज्ञान संवर्धन सम्मान से नवाजा गया। डा प्रतिभा मिश्रा, इंजी राजेश कुमार सिंह, विमल सिंह राठौर, डा आशीष त्रिपाठी, डा ब्रजेश दीक्षित और प्रो सीमा द्विवेदी समेत छह लोगों को जयंत सहस्रबुद्धे विज्ञान विशारद सम्मान से नवाजा गया।
सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि और विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डा शिव कुमार ने कहा कि विज्ञान की विविध शाखाओं के संबंध में विज्ञान भारती कार्यक्रम आयोजित करती रहती है। विज्ञान का जिक्र होते ही अंग्रेजी भाषा की चर्चा होती है। उन्होंने कहा कि आज चिकित्सा जगत में मनोचिकित्सक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में मन कोई आर्गन नहीं। मन की गति प्रकाश की गति से भी कई गुना अधिक है। मानव मन और मस्तिष्क को प्रभावित करती है भाषा। उन्होंने कहा कि भाषा केवल ज्ञान का प्रतिपादन ही नहीं करती है वरन यह विषय का स्पष्टीकरण भी करती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विज्ञान की अवधारणाओं के स्पष्टीकरण में भी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका है। विज्ञान का प्रसार भारतीय भाषाओं के जरिए हो इसी उद्देश्य से विज्ञान भारती लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और चिकित्सा की विविध विधाओं की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में समुचित ढंग से हो इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। उन्होंने उम्मीद जताई की कि यह सम्मेलन मेधा शक्ति के विकास का अहम कारण बनेगा।
शुरुआत में अतिथियों ने मां सरस्वती और भारती के चित्रों पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन किया।
संचालन डा अनुपम व्यास और प्रतिज्ञा पाण्डेय ने किया। विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना की। विभा मंत्र का गायन भी विद्यार्थियों ने किया।
इस राष्ट्रीय सम्मेलन के समन्वयक और विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के निदेशक प्रो डीके भट्ट ने सभी अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने सभी अतिथियों की उपलब्धियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में 490 शोध-पत्र आए हैं। डा जय प्रकाश शुक्ल ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान सम्मेलन की यात्रा 2014 से भोपाल से आरंभ हुई। यह सम्मेलन विज्ञान भारती के लक्ष्य की पूर्ति में सहायक बन रहा है। विज्ञान का कार्य मातृभाषा में हो इसके लिए हम सतत सक्रिय हैं। सम्मेलन में 23 तकनीकी सत्र होंगे जिनमें विज्ञान के विविध विषयों पर चर्चा होगी। हम अध्यात्म और योग पर भी विचार मंथन करेंगे। जय विज्ञान,जय हिंदी के नारे के साथ उन्होंने अपनी बात पूरी की।
सम्मेलन में आए अतिथियों ने शोध स्मारिका का भी विमोचन किया। उन्होंने विभा की प्रवेशांक पत्रिका का भी विमोचन किया।
योग गुरु डा मिलिंद त्रिपाठी ने योग से संबंधित क्रियाओं के लाभों का विवरण पेश किया। पुलिस अधिकारी अंजली ओरे ने योग के विभिन्न आसनों में अपने कौशल का प्रदर्शन किया।
अंत में विज्ञान भारती के कानपुर प्रांत के महासचिव डा सुनील मिश्र ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। मंच पर विभा के क्षेत्रीय संगठन मंत्री अंकित राय, बुविवि के कुलसचिव ज्ञानेंद्र शुक्ल, विभा झांसी के अध्यक्ष डा विजय यादव, डा संजीव श्रीवास्तव भी उपस्थित रहे।
इस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में विज्ञान भारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री प्रवीण रामदास, आचार्य राजाराम यादव, डा एसपी गौतम, मनोज कुमार पटैरिया, डा काव्या दुबे, डा अनु सिंगला, डा प्रियंका पाठक, डा शुभांगी निगम, डा सुमिरन श्रीवास्तव, इंजी रवि कुमार,डा कौशल त्रिपाठी, उमेश शुक्ल, डा राघवेंद्र दीक्षित, डा अभिषेक कुमार, देवेंद्र सिंह, अतीत विजय समेत अनेक लोग मौजूद रहे।

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