मौलिक चिंतन और वैज्ञानिकता से पूरी दुनिया को प्रभावी संदेश दें : विमल दुबे

झांसी। राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान सम्मेलन के समापन सत्र के मुख्य अतिथि और आयुक्त विमल दुबे ने कहा कि हमें अपने मौलिक चिंतन और वैज्ञानिकता के माध्यम से पूरी दुनिया को प्रभावी संदेश देना है। हमें मन, वचन और आचरण से एक होना होगा तभी देश का सर्वांगीण कल्याण होगा। उक्त उद्गार उन्होंने रविवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के गांधी सभागार में आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किए।
श्री दुबे ने कहा कि आज हम जिस दौर में वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है। अब भाषा किसी भी कार्य में बाधक नहीं है। हर भाषा का अनुवाद अब आसानी से हो सकता है। आज हमारी चुनौती बहुत बड़ी है। भारतीय ज्ञान परंपरा का विज्ञान में क्या योगदान है इस पर गंभीरता से विचार करना है। वैज्ञानिकता के विकास में भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रमुख योगदान यह है कि हमारे ऋषियों ने तीसरी दृष्टि विकसित करने की बात कही है। नवीन विचार, नवीन आविष्कार तभी सामने आते हैं जब सब कांसश माइंड सक्रिय होता है। विज्ञान भैरव तंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी रचना सैकड़ों साल पहले हुई। उन्होंने कहा कि आप सोचें कि पिछले तीन सौ साल में हमने कौन सा आविष्कार किया है, जिससे समूची मानव जाति का भला हुआ। इस सम्मेलन से हम यह संकल्प लेकर जाएं कि हम भी विज्ञान के क्षेत्र में कुछ प्रभावी और जनहितकारी योगदान करेंगे। केवल शोध पत्र लिख देने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। हमें यह सोचना होगा कि हमारी मौलिकता कहां गई। हमारा शोध समाज को कुछ लाभ दे रहा है या नहीं। अभी हम रटी रटाई बात करने की मानसिकता से काम कर रहे हैं। यह समझने की जरूरत है कि हमारी संस्कृति ने हमें क्या सिखाया है। संस्कृति ने सिखाया है कि हम संवेदनशील बनें। परस्पर सहयोग, समन्वय और स्वार्थ के परित्याग का भाव ही समाज को आगे बढ़ाएगा। जब तक मन, वचन और आचरण एक नहीं होगा तब तक समाज का कल्याण नहीं होगा।
श्री दुबे ने कहा कि हम एक गौरवशाली संस्कृति के भाग हैं। हमें अपने गौरव को कायम रखना है। हमें सर्व कल्याण के भाव को सबल कर अपने मौलिक चिंतन और वैज्ञानिकता के माध्यम से दुनिया को संदेश देना है कि वास्तव में हम विश्व गुरु हैं। ध्यान रखें कि हमारा चिंतन सर्वकालिक और सर्व हितकारी हो।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो संजय तिवारी ने कहा कि देश को विकसित बनाने के लिए बड़ी संख्या में वैज्ञानिक तैयार करने हैं। हम दस लाख में केवल ढाई सौ वैज्ञानिक पैदा करते हैं। हमने नवाचार के क्षेत्र में काफी कम काम किया है। अंग्रेजी भाषा ही रोड़ा बनी है। उन्होंने कहा कि जब तक विद्यार्थियों का कौशल नहीं बढ़ाएंगे देश को उन्नत और विकसित नहीं बना सकते हैं। उन्होंने मातृभाषा में काम करने के फायदे भी गिनाए। उन्होंने कहा कि सन 2047 तक भारत विश्व गुरु बने इसके लिए हमें सतत प्रयास करने होंगे। उन्होंने आयोजन समिति को हृदय से बधाई भी दी। आयोजन समिति की ओर मंडलायुक्त को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
यूके से आई डा दिव्या माथुर ने सभी आयोजकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने बताया कि सन 1990 से हिंदी के प्रचार प्रसार में लगी हुई हैं। लगातार हिंदी साहित्य सेवा कर रही हैं। वे विज्ञान से समाज में आ रहे बदलाव पर भी लगातार लेखन कर रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा को सोचने और समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि विज्ञान मानव के लिए वरदान है। साथ ही साथ अभिशाप भी है। विभिन्न उदाहरणों से विज्ञान के महत्व को रेखांकित किया।
विज्ञान भारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री देवेंद्र ने कहा कि स्थापना के समय से ही विज्ञान भारती हिंदी और अन्य देशी भाषाओं में विज्ञान का प्रसार करने की दृष्टि से काम कर रही है। यह सभी भारतीय भाषाओं में विज्ञान के प्रसार के लिए प्रयत्नशील है। हम विज्ञान से अंग्रेजी के प्रभुत्व को समाप्त करना चाहते हैं। हम विज्ञान को मातृभाषा के माध्यम से विस्तार देना चाहते हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं में विज्ञान की पढ़ाई का प्रावधान किया गया है। शोध कार्यों को जन जन तक पहुंचाना भी विज्ञान भारती का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि अगला राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान सम्मेलन दिल्ली में होगा।
डा अनुपम व्यास ने सम्मेलन की गतिविधियों और सभी प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में पांच सौ से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में नारी शक्ति की भागीदारी पचास प्रतिशत से ज्यादा है।
सम्मेलन के संयोजक प्रो डीके भट्ट ने मुख्य अतिथि को पुष्प गुच्छ भेंट कर सम्मानित किया। अन्य अतिथियों को भी सम्मानित किया गया।
आयोजन सचिव डा संजीव श्रीवास्तव ने सम्मेलन की रिपोर्ट पेश की। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में देशभर के प्रतिनिधि आए।
इस सत्र में विज्ञान भारती के प्रांत उपाध्यक्ष प्रो एसपी शुक्ल, डा एसपी गौतम, अंकित राय, डा जेपी शुक्ल, डा विजय यादव, डा काव्या दुबे, डा सुनील मिश्र, इं एपीएस गौर, डा सुमिरन श्रीवास्तव, डा शुभांगी निगम, डा अंजली श्रीवास्तव, डा साक्षी दुबे, डा संतोष पाण्डेय, आनंद पाण्डेय, डा अंजली श्रीवास्तव, प्रतिज्ञा पाठक, सत्येन्द्र उपाध्याय, डा राघवेंद्र दीक्षित, उमेश शुक्ल, विजय अतीत, शाश्वत सिंह समेत अनेक लोग मौजूद रहे। संचालन डा अनुपम व्यास ने किया। अच्छा शोध-पत्र प्रस्तुत करने वालों को पुरस्कृत भी किया गया। अंत में सम्मेलन की सह संयोजिका डा अनु सिंगला ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।

शोध-पत्र पर मिला पुरस्कार

शोध पत्र प्रस्तुति के लिए प्रथम सत्र में प्रियंका को प्रथम, करन सिंह को द्वितीय तथा अमित को तृतीय पुरस्कार मिला। दूसरे सत्र में काजल सिंह को प्रथम स्थान मिला। तृतीय सत्र में कपिल अहिरवार ने प्रथम, निधि तिवारी ने द्वितीय तथा आकांक्षा सिंह ने तृतीय पुरस्कार हासिल किया।
चौथे सत्र में पलक ने पहला, अद्वितीय जैन ने दूसरा तथा रामेंद्र यादव ने तीसरा स्थान प्राप्त किया। फार्मेसी में अमन कुमार प्रथम, सोमेश और महिमा को दूसरा और शुमाली को तीसरा स्थान मिला।
वास्तु विद्या सत्र में पूनम टंडन प्रथम, अर्पिता सोनी और ईशा दूसरे तथा दिनकर दुबे तृतीय स्थान पर रहे। विधि सत्र में नेहा प्रथम रहीं। ऊर्जा सत्र में रामकुमार प्रथम रहे।

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