देहरादून।
विश्व पत्र लेखन दिवस प्रति वर्ष 1 सितंबर को दुनिया भर में उत्साह के साथ विचारों को पृष्ठ पर प्रस्तुत करने की कलात्मकता के विकास के दिवस के रूप में मनाया जाता है।
देवभूमि यूनिवर्सिटी के डीन डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने इस दिवस पर आयोजित गोष्ठी पर विचार रखते हुए कहा कि, इस विशेष दिन का मुख्य उद्देश्य डिजिटल युग में स्क्रीन और कीबोर्ड से दूरी बनाकर, हाथों से पत्र (चिट्ठी) लिखने की पारंपरिक और खूबसूरत कला को पुनर्जीवित करना भी है।इस दिवस के इतिहास और महत्व प्रकाश ड़ालते हुए डॉदीक्षित ने बताया कि, दिवस की स्थापना साल 2014 में ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध लेखक, कलाकार और फोटोग्राफर रिचर्ड सिम्पकिन ने की थी।रिचर्ड सिम्पकिन को हस्तलिखित पत्र प्राप्त करने और लिख कर पत्र डाक द्वारा भेजने का गहरा शौक था। उन्होंने महसूस किया कि आज की भागदौड़ भरी डिजिटल जिंदगी में लोग मैसेज और ईमेल में व्यस्त हैं, जिससे संवाद की गहराई खोती जा रही है।
इस अवसर पर डॉ. सागर सक्सेना ने दिवस की उपयोगिता पर बल देते हुए कहा कि, यह दिवस हमें याद दिलाता है कि कागज पर कलम से लिखे गए शब्द सिर्फ संदेश नहीं होते, बल्कि उनमें लिखने वाले की भावनाएं, धैर्य और स्पर्श भी छुपा होता है जो हमेशा के लिए यादगार बन जाता है।
श्रीमती मीना तिवारी ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज के दिन आप एक अच्छा सा कागज और पेन उठाएं और अपने माता-पिता, पुराने दोस्त, जीवनसाथी या किसी करीबी को एक प्यारा सा हस्तलिखित पत्र लिखें। आज के दिन आप कुछ समय के लिए सोशल मीडिया और इंस्टेंट मैसेजिंग से दूरी बनाएं। अगर आपके पास पुरानी चिट्ठियां या पोस्टकार्ड रखे हैं, तो उन्हें आज के दिन दोबारा पढ़ें और पुरानी यादों को संजोते हुए उन यादो को ताजा करें
ऑनलाइन वेबिनार के रूप में आयोजित इस गोष्ठी में कई विद्वान्, लेखक, समाजसेवी एवं छात्र-छात्राये एक मंच पर आकर अपने विचार प्रस्तुत किये हुए
