देहरादून।
उत्तराखण्ड मे मौजूद चार धाम मे प्रमुख बद्रीनाथ धाम के कपाट इस वर्ष 23 अप्रैल 2026 को सुबह 6:15 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे।
यह घोषणा बसंत पंचमी के पावन अवसर पर की गई है। दर्शन के लिए उत्तराखंड सरकार की वेबसाइट पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, जो 6 मार्च 2026 से शुरू हो चुका है।
श्री बदरीनाथ धाम उत्तराखण्ड प्रदेश के सीमान्त जनपद चमोली के उत्तरी भाग में हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित है । इस धाम का वर्णन स्कन्द पुराण, केदारखण्ड, श्रीमद्भागवत आदि अनेक धार्मिक ग्रन्थों में आया है। पौराणिक श्रुति के अनुसार महाबली राक्षस सहस्रकवच के अत्याचारों से परेशान हो कर ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने धर्म के पुत्र के रूप में दक्ष प्रजापति की पुत्री मातामूर्ति के गर्भ से नर-नारायण के रूप भगवान ने अवतार लिया और जगत कल्याण के लिए इस स्थान पर घोर तपस्या की थी । भगवान बदरीनाथ जी का मन्दिर अलकनन्दा के दाहिने तट पर स्थित है जहां पर भगवान बदरीनाथ जी की शालिग्राम पत्थर की स्वयम्भू मूर्ति की पूजा होती है ।
नारायण की यह मूर्ति चतुर्भुज अर्द्धपद्मासन ध्यानमगन मुद्रा में उत्कीर्णित है । बताते हैं कि भगवान विष्णुजी ने नारायण रूप में सतयुग के समय यहाँ पर तपस्या की थी । यह मूर्ति अनादिकाल से है और अत्यन्त भव्य एवं आकर्षक है । इस मूर्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिसने जिस रूप में इसे देखा उसे इसमें अनेक इष्टदेवों के दर्शन प्राप्त हुये। आज भी हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख आदि सभी वर्गों के अनुयायी यहाँ आकर श्रद्धा से पूजा अर्चना करते हैं । इस धाम का नाम बदरीनाथ क्यों पड़ा इसकी भी एक पौराणिक कथा है। राक्षस सहस्रकवच के संहार से वचनबद्ध होकर जब भगवान विष्णु नर-नारायण के बालरूप में थे तो देवी लक्ष्मी भी श्री नारायण जी की रक्षा में बेर-वृक्ष के रूप में अवतरित हुई तथा सर्दी, वर्षा, तूफान, हिमादि से भगवान की रक्षा के लिए बेर-वृक्ष ने नारायण को चारों ओर से ढक लिया । बेर-वृक्ष को बदरी भी कहते हैं। इसी कारण से लक्ष्मीनाथ भगवान विष्णु लक्ष्मी के बदरी रूप से इस धाम का बरीनाथ कहलाया जाता है
