दोस्ती का रिश्ता यथार्थ का है ना कि स्वार्थ का- डाॅ० संदीप सरावगी रिपोर्ट: अनिल मौर्य
झाँसी। वर्तमान के आपाधापी भरे युग में इंसान रिश्तों को भूलता जा रहा है सारे रिश्ते मोबाइल और सोशल मीडिया तक सीमित रह गये हैं। अधिकांश रिश्ते हमें जन्म से एवं कुछ उसके बाद स्वतः ही मिल जाते हैं लेकिन दोस्ती का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम स्वयं चुनते हैं। ऐसे कई उदाहरण…
