उस 13वें महीने की अमर गाथा, जिसे संसार ने दुत्कार दिया था और भगवान विष्णु ने अपना नाम दे दिया
सनातन धर्म के पंचांग और काल-गणना का आधार केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि अत्यंत सूक्ष्म खगोल विज्ञान है। जब आकाश में सूर्य और चंद्रमा की गतियों का समन्वय किया गया, तब 12 महीनों के साथ-साथ एक ऐसे 13वें महीने का प्राकट्य हुआ जिसकी व्यथा, अपमान और अंततः वैकुंठ में मिले परम सम्मान की गाथा पद्म पुराण और भविष्य पुराण में बड़े ही भावपूर्ण ढंग से वर्णित है।
सृष्टि के आरंभ में जब काल चक्र का निर्धारण हो रहा था, तब ऋषियों और खगोलविदों के सामने एक गणितीय चुनौती आई। सूर्य वर्ष (सौर वर्ष) लगभग 365 दिन और 6 घंटे का होता है, जबकि चंद्रमा के 12 चक्रों पर आधारित चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इस प्रकार हर वर्ष सौर और चंद्र गणना में लगभग 11 दिनों का अंतर छूट जाता था। यदि इस अंतर को संतुलित न किया जाता, तो कुछ ही दशकों में ऋतुओं और महीनों का तालमेल पूरी तरह टूट जाता—कड़ाके की ठंड में सावन आने लगता और ज्येष्ठ की तपती दोपहरी में हेमंत ऋतु का भ्रम हो जाता।
प्रकृति के संतुलन को साधने के लिए खगोलीय नियमों के तहत हर बत्तीस महीने और सोलह दिन (लगभग तीन वर्ष) के अंतराल पर उन संचित दिनों को जोड़कर एक अतिरिक्त महीने की रचना की गई, जिसे ‘अधिक मास’ कहा गया।
काल की सत्ता बांटते समय पितामह ब्रह्मा जी ने वर्ष के नियमित 12 महीनों का स्वामित्व नवग्रहों, नक्षत्रों और भगवान विष्णु के 12 स्वरूपों को सौंप दिया। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ से लेकर फाल्गुन तक के सभी महीनों को एक-एक अधिपति देवता मिला। देवताओं ने उन 12 महीनों को अपना आशीर्वाद दिया, जिसके कारण उन मासों में यज्ञ, अनुष्ठान, विवाह, मुंडन, गृह-प्रवेश और नामकरण जैसे समस्त मांगलिक कार्य संपन्न करने की अनुमति मिल गई।
परंतु संकट तब खड़ा हुआ जब उस तेरहवें अतिरिक्त महीने के आधिपत्य का प्रश्न आया। उस महीने की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसमें सूर्य का कोई राशि-परिवर्तन (संक्रांति) नहीं होता था। सूर्य शून्य होने के कारण किसी भी देवता, यक्ष, गंधर्व या नक्षत्र ने उसका स्वामी बनना स्वीकार नहीं किया। सबने उसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया।
देवताओं द्वारा त्यागे जाने के बाद सांसारिक व्यवस्था और समाज ने भी उस महीने को पूरी तरह हीन दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। चूंकि उसमें कोई संक्रांति नहीं थी, इसलिए पंडितों ने उसे ‘सूर्यहीन’ और ‘मलिन’ ठहराकर उसका नाम ‘मलमास’ रख दिया। समाज में यह नियम बना दिया गया कि इस महीने में कोई भी नया कार्य, विवाह, सगाई, नया वस्त्र धारण करना या कोई भी मंगल संस्कार नहीं होगा।
वह महीना काल पुरुष की व्यवस्था में एक सजीव सत्ता के समान था। जब उसने देखा कि संसार के सभी जीव, पशु-पक्षी, वृक्ष और 12 महीने अपनी-अपनी प्रतिष्ठा पर गर्व कर रहे हैं और अकेले उसी को अछूत समझकर हर शुभ कार्य से बहिष्कृत कर दिया गया है, तो उसका हृदय दारुण दुःख से भर गया। सर्वत्र अपनी निंदा, तिरस्कार और अपमान देखकर वह अतिरिक्त मास रो पड़ा।
अत्यंत लज्जित और व्यथित होकर वह मलमास एक कांतिहीन, दुर्बल पुरुष का रूप धारण करके सीधे वैकुंठ धाम पहुंचा। वैकुंठ के द्वार पर पहुंचकर वह भगवान श्रीहरि नारायण के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर विलाप करने लगा।
भगवान विष्णु ने उस अश्रुपूर्ण अतिथि को देखा और बड़े स्नेह से पूछा, “हे वत्स! तुम कौन हो? और तुम्हारी इस दशा का क्या कारण है? तुम तीनों लोकों के स्वामी के धाम में इतने व्याकुल क्यों हो?”
मलमास ने हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा:
“हे जगन्नाथ! हे दीनानाथ! आपकी इस रची हुई सृष्टि में चींटी से लेकर हाथी तक और एक साधारण तृण से लेकर देवराज इंद्र तक, सभी का कोई न कोई मान है, सभी का एक निश्चित स्थान है। सब किसी न किसी के द्वारा पूजे जाते हैं। परंतु मेरा क्या अपराध था प्रभु?
ऋषियों ने मुझे काल के संतुलन के लिए उत्पन्न तो किया, परंतु किसी देवता ने मुझे अपनाया नहीं। संसार मुझे ‘मलमास’ कहकर पुकारता है, लोग मुझसे घृणा करते हैं। मेरे आते ही सारे मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। मुझे अशुद्ध, अछूत और पापी समझा जाता है। हे नारायण! जब सृष्टि में मेरे अस्तित्व का कोई सम्मान ही नहीं है, तो कृपा करके मुझे अपने चक्र से समाप्त कर दीजिए। इस अपमानजनक जीवन से तो मृत्यु भली है प्रभु!
शरणागत का यह क्रंदन सुनकर भगवान विष्णु का हृदय करुणा से भर गया। भगवान नारायण ने झुककर उस उपेक्षित महीने को अपने दोनों हाथों से उठाया और अपने वक्षस्थल से लगा लिया।
भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा:
“हे मास! शांत हो जाओ। जिस संसार ने तुम्हें त्यागा है, उसने काल के सबसे बड़े सत्य की उपेक्षा की है। वे नहीं जानते कि तुम प्रकृति के संतुलन के मूल आधार हो। आज के बाद तुम्हें किसी देवता के आगे हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं है। जिन देवताओं ने तुम्हारा तिरस्कार किया है, मैं उन सभी का स्वामी हूँ। इसलिए आज से तुम्हारा अधिपति मैं स्वयं बनता हूँ।”
श्रीहरि ने आगे दिव्य घोषणा करते हुए कहा:
“संसार ने तुम्हें ‘मलमास’ नाम देकर तुम्हारा उपहास उड़ाया है, परंतु आज से मैं तुम्हें अपना सबसे दिव्य, गोपनीय और श्रेष्ठ नाम प्रदान करता हूँ। आज के बाद तीनों लोकों में तुम ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से विख्यात होगे। जिस प्रकार समस्त पुरुषों और देवताओं में मैं ‘पुरुषोत्तम’ हूँ, उसी प्रकार काल के समस्त महीनों में तुम मेरे स्वरूप होकर सर्वश्रेष्ठ गिने जाओगे।
भगवान ने उस महीने को ऐसा वरदान दिया जिसने उसकी स्थिति को शून्य से अनंत तक पहुंचा दिया। प्रभु ने कहा:
“सांसारिक सुखों के लिए होने वाले विवाह और भोग-विलास भले ही तुम्हारे समय में न हों, परंतु जो जीव तुम्हारे इस महीने में केवल आत्म-कल्याण, हरि नाम संकीर्तन, श्रीमद्भागवत का श्रवण, दीपदान और निस्वार्थ सेवा करेगा, उसे मिलने वाला पुण्य बाकी 12 महीनों के पुण्यों से भी कोटि गुना अधिक होगा। अन्य महीनों में मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार सीमित फल मिलता है, परंतु तुम्हारे महीने में किए गए साधारण से जप का फल भी मैं वैकुंठ धाम की प्राप्ति के रूप में दूंगा। तुम समस्त महीनों के मुकुटमणि बनोगे।
भगवान विष्णु के इस वरदान से उस तिरस्कृत महीने की मलीनता क्षण भर में समाप्त हो गई। वह दिव्य तेज से चमक उठा और उसने हाथ जोड़कर प्रभु के चरणों में शीश नवाया यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में हर तीसरे वर्ष जब अधिक मास आता है, तो भले ही सांसारिक विलास के उत्सव थम जाते हों, परंतु यह समय आत्मा की शुद्धि, तपस्या, दान और ईश्वर भक्ति का सबसे बड़ा महापर्व बन जाता है। जिस महीने को संसार ने ‘मैल’ मानकर फेंक दिया था, भगवान की शरण में आते ही वह ‘पुरुषोत्तम’ बनकर अमर हो गया।
!! जय श्री #कृष्णा!!
